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श्री चन्द्रशेखरेन्द्रसरस्वतीविरचित ॥ शिवगीतिमाला॥ (शिवाष्टपदी)

Shivagitimala (Shivashtapadi)
by Jagadguru Sri Chandrasekharendra Saraswathi (62nd Shankaracharya of
Shri Kanchi Kamakoti Peetham)


प्रथम: सर्गः
ध्यानश्लोकाः

सकलविघ्ननिवर्तक शङ्करप्रियसुत प्रणतार्तिहर प्रभो॥
मम हृदम्बुजमध्यलसन्मणीरचितमण्डपवासरतॊ भव ॥ १ ॥
विधिवदनसरॊजावासमाध्वीकधारा
विविधनिगमवृन्दस्तूयमानापदाना ।
समसमयविराजच्चन्द्रकॊटिप्रकाशा
मम वदनसरॊजे शारदा संनिधत्ताम् ॥ २ ॥
यदनुभवसुधॊर्मीमाधुरीपारवश्यं
विशदयति मुनीनात्मनस्ताण्डवेन ।
कनकसदसि रम्ये साक्षिणीवीक्ष्यमाणः
प्रदिशतु स सुखं मे सॊमरॆखावतंसः ॥ ३ ॥
शर्वाणि पर्वतकुमारि शरण्यपादे
निर्वापयास्मदघसन्ततिमन्तरायम् ।
इच्छामि पङ्गुरिव गाङ्गजलावगाह-
मिच्छामिमां कलयितुं शिवगीतिमालाम् ॥ ४ ॥
शिवचरणसरॊजध्यानयॊगामृताब्धौ
जलविहरणवाञ्छासंगतं यस्य चॆतः ।
निखिलदुरितमभङ्गव्यापृतं वा मनॊज्ञं
परशिवचरिताख्यं गानमाकर्णनीयम् ॥ ५ ॥

॥ प्रथमाष्टपदी ॥
मालवीरागॆण                                                        आदितालॆन गीयते
(प्रलयपयॊधिजले इतिवत्)

कनकसभासदने वदने दरहासं
नटसि विधाय सुधाकरभासं
शंकर धृततापसरूप                                जय भवतापहर ॥ १ ॥
जलधिमथनसमये गरलानलशैलं
वहसि गलस्थमुदित्वरकीलं
शंकर धृतनीलगलाख्य                                      जय भवतापहर ॥ २ ॥
विधुरविरथचरणे निवसन्नवनिरथे
पुरमिषुणा हृतवानितयॊधे
शंकर वर वीरमहॆश                                          जय भवतापहर ॥ ३ ॥
कुसुमशरासकरं पुरतॊ विचरन्तं
गिरिश निहिंसितवानचिरं तं
शंकर मदनारिपदाख्य                             जय भवतापहर ॥ ४ ॥
वटतरुतलमहिते निवसन्मणिपीठे
दिशसि परात्मकलामतिगाढे
शंकर धृतमौन गभीर                              जय भवतापहर ॥ ५ ॥
जलनिधिसेतुतटे जनपावनयोगे
रघुकुलतिलकयश: प्रविभागे
शंकर रघुराममहेश                                           जय भवतापहर॥ ६ ॥
तनु भृदवनकृते वरकाशीनगरे
तारकमुपदिशसि स्थलसारे
शंकर शिव विश्वमहेश                                       जय भवतापहर ॥ ७ ॥
निगमरसालतले निरवधिबॊधघन
श्रीकामक्षिकुचकलशाङ्कन
शंकर सहकारमहेश                                          जय भवतापहर॥ ८ ॥
कच्छपतनुहरिणा निस्तुलभक्तियुजा
संततपूजितचरणसरोज
शंकर शिव कच्छप लिङ्ग                        जय भवतापहर ॥ ९ ॥
शंकरवरगुरुणा परिपूजितपाद
काञ्चिपुरे विवृताखिलवेद
शंकर विधुमौलिमहेश                                       जय भवतापहर ॥ १० ॥
श्रीविधुमौलियतेरिदमुदितमुदारं
श्रृणु करुणाभरणाखिलसारं
शंकरारुणशैलमहेश                                          जय भवतापहर ॥ ११ ॥

 

श्लॊकः
कनकसभानटाय हरिनीलगळाय नम-
स्त्रिपुरहराय माररिपवे मुनिमोहभिदे ।
रघुकृतसेतवे विमलकाशिजुषे भवतॆ
निगमरसाल कूर्महरिपूजित चन्द्रधर॥ ॥ ६ ॥
पापं वारयते परं घटयते कालं पराकुर्वते
मोहं दूरयते मदं शमयते मत्तासुरान् हिंसते ।
मारं मारयते महामुनिगणानानन्दिन: कुर्वते
पार्वत्या सहिताय सर्वनिधये शर्वाय तुभ्यं नम: ॥ ७ ॥

 

॥ द्वितीयाष्टपदी ॥
भैरवीरागॆण                                                          त्रिपुटतालेन गीयते
( श्रितकमलाकुच इतिवत् )
कलिहरचरितविभूषण श्रुतिभाषण
करतलविलसितशूल                                         जय भवतापहर ॥ १ ॥
दिनमणिनियुतविभासुर विजितासुर
नलिननयनकृतपूज                                                     जय भवतापहर ॥ २ ॥
निर्जितकुसुमशरासन पुरशासन
निटिलतिलकशिखिकील                                             जय भवतापहर ॥ ३ ॥
पदयुगविनताखण्डल फणिकुण्डल
त्रिभुवनपावन पाद                                                    जय भवतापहर ॥ ४ ॥
अन्धकदानवदारण भवतारण
स्मरतनुभसितविलेप                                        जय भवतापहर ॥ ५ ॥
हिमकरशकलवतंसक फणिहंसक
गगनधुनीधृतशील                                                     जय भवतापहर ॥ ६ ॥
परमतपोधनभावित सुरसेवित
निखिलभुवनजनपाल                                                 जय भवतापहर ॥ ७ ॥
करिमुखशरभवनन्दन कृतवन्दन
श्रृणुशशिधरयतिगीतं                                        जय भवतापहर ॥ ८ ॥

श्लॊकः
तुहिनगिरिकुमारी तुङ्गवक्षोजकुम्भ-
स्फुटदृढपरिरम्भश्लिष्ट दिव्याङ्गरागम् ।
उदितमदनखेदस्वेदमंसान्तरं मां
अवतु परशुपाणेर्व्यक्त गाढानु्रागम् ॥ ८ ॥
वासन्तिकाकुसुमकोमलदर्शनीयै:
अङ्गैरनङ्गविहितज्वरपारवश्यात् ।
कम्पातटोपवनसीमनि विभ्रमन्तीं
गौरिमिदं सरसमाह सखी रहस्यम् ॥ ९ ॥

 

॥ तृतीयाष्टपदी ॥
वसन्तरागेण                                                  आदितालेन गीयते
( ललितलवंगलता इतिवत् )
विकसदमलकुसुमानुसमागमशीतलमृदुलसमीरे
अतिकुलकलरवसंभृतघनमदपरभृतघोषगभीरे
विलसति सुरतरुसदसि निशान्ते
वरयुवतिजनमोहनतनुरिह शुभदति विततवसन्ते विलसति ॥ १ ॥
कुसुमशरासनशबरनिषूदितकुपितवधूधृतमानॆ
धनरसकुङ्कुमपङ्कविलेपनविटजनकुतुकविधाने विलसति ॥ २ ॥
कुसुमितबालरसालमनोहरकिसलयमदनकृपाणे
मधुकरमिथुनपरस्परमधुरसपाननियोगधुरीणे विलसति ॥ ३ ॥
मदनमहीपतिशुभकरमन्त्रजपायितमधुकरघॊषे
अविरलकुसुममरन्दकृताभिनिषॆचनतरुमुनिपोषे विलसति ॥ ४ ॥
मदननिदेशनिवृत्तकलेबरमर्दनमलयसमीरे
तुषितमधुव्रतसंचलदतिथिसुपूजनमधुरसपूरे विलसति ॥ ५ ॥
सुचिरकृतव्रतमौनवनप्रियमुनिजनवागनुकूले
ललितलतागृहविहृतिकृतश्रमयुवतिसुखानिलशीले विलसति ॥ ६ ॥
विषमशरावनिपालरथायितमृदुलसमीरणजाले
विरहिजनाशयमोहनभसितपरागविजृम्भणकाले विलसति ॥ ७ ॥
श्रीशिवपूजनयतमति चन्द्रशिखामणियतिवरगीतं
श्रीशिवचरणयुगस्मृतिसाधकमुदयतु वन्यवसन्तं विलसति ॥ ८ ॥

श्लोकः
विकचकमलकम्पाशैवलिन्यास्तरङ्गै:
अविरलपरिरम्भ: संभ्रमन् मञ्जरीणाम् ॥

परिसररसरागैर्व्याप्तगात्रानुलेपो
विचरति कितवॊऽयं मन्दमन्दं समीर: ॥ १० ॥

 

॥ द्वितीयः सर्ग: ॥
श्लॊकः
प्रगल्भतरभामिनी शिवचरित्र गानामृत-
प्रभूतनवमञ्जरीसुरभिगन्धिमन्दानिले ।
रसालतरुमूलगस्फुरितमाधवी मण्डपे
महेशमुपदर्शयन्त्यसकृदाह गौरीमसौ ॥

 

॥ चतुर्थाष्टपदी ॥
रामक्रियारागॆण                                                     आदितालॆन गीयते
( चन्दनचर्चित इतिवत् )
अविरल कुङ्कुमपङ्ककरम्बितमृगमदचन्द्रविलेपं
निटिल विशेषकभासुरवह्निविलोचन कृतपुरतापं
शशिमुखि शैलवधूतनयॆ विलोकय हरमथ केलिमये शशिमुखि ॥ १ ॥
युवतिजनाशयमदनशरायितशुभतरनयन विलासं
भुवनविजृम्भितघनतरतिमिरनिषूदननिजतनु भासं शशिमुखि ॥ २ ॥
पाणि सरोजमृगीपरिशङ्कितबालतृणालिगलाभं
यौवतहृदयविदारणपटुतरदरहसितामितशोभं शशिमुखि ॥३ ॥
चरणसरोजलसन्मणिनूपुरघॊषविवृतपदजातं
गगनधुनीसमतनुरुचिसंहतिकारितभुवनविभातं शशिमुखि ॥ ४ ॥
निखिलवधूजनहृदयसमाहृतिपटुतरमोहनरूपं
मुनिवरनिकरविमुक्तिविधायकबॊधविभावनदीपं शशिमुखि ॥ ५ ॥
विकचसरोरुहलोचनसकृदवलोकनकृतशुभजातं
भुजगशिरोमणिशोणरुचा परिभीतमृगीसमुपेतं  शशिमुखि ॥ ६ ॥
रजतमहीधरसदृशमहावृषदृष्टपुरोवनिभागं
सनकसनन्दनमुनिपरिशोभितदक्षिणतदितरभागं शशिमुखि ॥ ७ ॥
श्रीशिवपरिचरणव्रतचन्द्रशिखामणि नियमधनेन
शिवचरितं शुभगीतमिदं कृतमुदयतु बोधघनेन शशिमुखि ॥ ८ ॥
श्लॊकः
मदनकदनशान्त्यै फुल्लमल्ली प्रसूनैः
विरचितवरशय्यामाप्नुवन्निन्दुमौलि: ।
मृदुमलयसमीरं मन्यमान: स्फुलिङ्गान्
कलयति हृदये त्वामन्वहं शैल कन्ये ॥ १२ ॥
इति सहचरीवाणीमाकर्ण्य सापि सु्धाझरीं
अचलदुहिता नेतु: श्रुत्वाभिरूप्यगुणॊदयम् ।
विरहजनितामार्तिं दूरीचकार हृदि स्थितां
दयितनिहितप्रेमा कामं जगाद मिथ: सखीम् ॥ १३ ॥

 

॥ पञ्चमाष्टपदी ॥
तॊडिरागॆण                                                           चापुतालेन गीयते
( सञ्चरदधर इतिवत् )
जलरुहशिखरविराजितहिमकरशङ्कितकरनखराभं
रुचिररदनकिरणामरसरिदिव शोणनदाधर शोभं
सेवे निगमरसालनिवासं - युवतिमनोहरविविधविलासं सेवे ॥ १ ॥
शुभतनुसौरभलॊभविभूषणकैतवमहित भुजंगं
मुकुटविराजितहिमकरशकलविनिर्गलदमृतसिताङ्गं सेवे ॥ २ ॥
मकुटपरिभ्रमदमरधुनीनखविक्षतशङ्कित चन्द्रं
उरसि विलेपितमलयजपङ्कविमर्दितशुभतरचन्द्रं सेवे ॥ ३ ॥
पन्नगकर्णविभूषणमौलिगमणिरुचि शोणकपोलं
अगणितसरसिजसम्भवमौलिकपालनिवेदित कालं सेवे ॥ ४ ॥
हरिदनुपालसुरेशपदॊन्नतिमुपनमतो वितरन्तं
अनवधिमहिमचिरंतनमुनिहृदयेषु सदा विहरन्तं सेवे ॥ ५ ॥
नारदपर्वतवरमुनिकिन्नरसन्नुत वैभव जातं
अन्धकसुररिपुगन्धसिन्धुर विभङ्गमृगादिपरीतं सेवे ॥ ६ ॥
विषयविरतविमलाशयकोशमहाधनचरणसरोजं
घनतरनिजतनुमञ्जुलतापरि निर्जितनियुत मनोजं सेवे ॥ ७ ॥
श्रीशिव भजन मनोरथचन्द्रशिखामणियतिवरगीतं
श्रोतुमुदञ्चितकौतुकमविरतममरवधूपरि गीतं सेवे ॥ ८ ॥

श्लॊकः
सहचरि मुखं चॆत: प्रात: प्रफुल्लसरोरुह-
प्रतिममनघं कान्तं कान्तस्य चन्द्रशिखामणॆ: ।
स्मरति परितोदृष्टिस्तुष्टा तदाकृतिमाधुरी-
गतिविषयिणी वाणी तस्य ब्रवीति गुणोदयम् ॥ १४ ॥

 

षष्टाष्टपदी
काम्भोजिरागॆण                                                     त्रिपुटतालॆन गीयते
( निभृतनिकुञ्ज इतिवत् )
निखिलचराचरनिर्मितिकौशलभरितचरित्र विलोलं
ललितरसालनिबद्धलतागृहविहरण कौतुक शीलं
कलये कालमथनमधीशं
घटय मया सह घनतरकुचपरिरम्भण केलिकृताशं  कलये ॥१॥
कुवलयसौरभवदनसमीरणवसितनिखिलदिगन्तं
चरणसरोजविलोकनतॊऽखिलतापरुजं शमयन्तं कलये ॥२॥
पटुतरचाटुवचोमृतशिशिरनिवारितमनसिजतापं
तरुणवनप्रियभाषणया सह सादरविहितसुलापं कलये ॥३॥
चलितदृगञ्चलमसमशरानिव युवतिजने निदधानं
रहसि रसालगृहं गतया सह सरसविहारविधानं कलये ॥४॥
दरहसितद्युतिचन्द्रिकया गतखेद विकारचकोरं
लसदरुणाधरवदनवशीकृतयुवतिजनाशयचॊरं कलये ॥५॥
मलयजपङ्कविलेपनमुरुतरकुचयुगमाकलयन्तं
कृतकरुषॊ मम सुतनुलतापरिरम्भणकेळिमयन्तं कलये ॥६॥
सुरतरुकुसुमसुमालिकया परिमण्डितचिकुरनिकायं
अलघुपुलककटसीमनि मृगमदपत्रविलेखविधेयं कलये॥७॥
श्रीशिवसेवनचन्द्रशिखामणियतिवरगीतमुदारं
सुखयतु शैलजया कथितं शिवचरितविशेषितसारं कलये ॥८॥

श्लोकः
लीलाप्रसूनशरपाशसृणिप्रकाण्ड-
पुण्ड्रेक्षुभासिकरपल्लवमम्बुजाक्षम् ।
आलोक्य सस्मितमुखेन्दुकमिन्दुमौलिं
उत्कण्ठते हृदयमीक्षितुमेव भूय: ॥१५॥

तृतीयः सर्ग:
श्लोकः
इति बहु कथयन्तीमालिमालोक्य बालां
अलघुविरहदैन्यामद्रिजामीक्षमाण: ।
सपदि मदनखिन्न: सोमरेखावतंस:
किमपि विरहशान्त्यै चिन्तयामास धीर: ॥१६॥

 

॥ सप्तमाष्टपदी ॥
भूपालरागॆण                                                                 त्रिपुटतालेन गीयते
(मामियं चलिता इतिवत्)
श्लॊकः
लीलया कलहे गता कपटक्रुधा वनितेयं
मानिनी मदनेन मामपि संतनोति विधेयम् ॥
शिव शिव कुलाचलसुता ॥१॥
तापितो मदनज्वरेण तनूनपादधिकेन
यापयमि कतं नु तद्विरहं क्षणं कुतुकेन शिव शिव ॥२॥
यत्समागमसंमदेन सुखी चिरं विहरामि ।
यद्वियोगरुजा न जातु मनोहितं वितनोमि शिव शिव ॥३॥
लीलया कुपिता यदा मयि तामथानुचरामि ।
भूयसा समयेन तामनुनीय संविहरामि शिव शिव ॥४॥
अर्पितं शिरसि क्रुधा मम हा यदङ्घ्रिसरोजं
पाणिना परिपूजितं बत जृम्भमाणमनोजं शिव शिव ॥५॥
दृश्यसे पुरतॊऽपि गौरि न दृश्यसे चपलेव ।
नापराधकथा मयि प्रणतं जनं कृपयाव शिव शिव ॥६॥
नीलनीरदवेणि किं तव मत्कृतेऽनुनयॆन ।
सन्निधेहि न गन्तुमर्हसि मादृशे दयनेन शिव शिव ॥७॥
वर्णितं शिवदासचन्द्रशिखामणिश्रमणेन ।
वृत्तमेतदुदेतु सन्ततं ईशितु: प्रवणेन शिव शिव ॥८॥

श्लोकः
भुवनविजयी विक्रान्तेषु त्वमेव न चेतर:
तव न कृपणे युक्तं मादृग्विधे शरवर्षणम् ।
मदन यदि ते वैरं निर्यातु भो नियतं पुरा
विहितमहितो नाहं नित्यं तवास्मि निदेशग: ॥१७॥
मधुकरमयज्याघॊषेण प्रकम्पयसे मन:
परभृतवधूगाने कर्णज्वरं तनुषेतराम् ।
कुसुमरजसां बृन्दैरुत्मादयस्यचिरादित:
स्मर विजयसे विश्वं चित्रीयते कृतिरीदृशी ॥१८॥
चलितललितापाङ्ग श्रेणीप्रसारणकैतवात्
दरविकसितस्वच्छच्छायासितोत्पलवर्षणैः ।
विरहशिखिना दूनं दीनं न मामभिरक्षितुं
यदि न मनुषे जानासि त्वं मदीयदशां तत: ॥१९॥
शुभदति विचराव: शुभ्रकम्पातटिन्यास्तट
भुवि रमणीयोद्यानकेळिं भजाव: ।
प्रतिमुहुरिति चिन्ताविह्वल: शैलकन्यामभि
शुभतरवाद: पातु चन्द्रार्धमौले: ॥२०॥

 

चतुर्थः सर्ग:
श्लोकः
कम्पातीरप्रचुररुचिरोद्यानविद्योतमान-
श्रीमाकन्दद्रुमपरिसर माधवीक्लृप्तशालाम् ।
अध्यासीनं रहसि विरहश्रान्तमश्रान्तकेलिं
वाचं गौरीप्रियसहचरी प्राह चन्द्रावतंसम् ॥२१॥

 

॥ अष्टमाष्टपदी ॥
सौराष्ट्ररागेण                                                                                                  आदितालेन गीयते
(निन्दति चन्दनं इतिवत्)
या हि पुरा हर कुतुकवती परिहासकथासु विरागिणी
असितकुटिल चिकुरावळि मण्डनशुभतरदाम निरोधिनी
शंकर शरणमुपैति शिवामतिहन्ति स शम्बरवैरी शिव विरहकृशा तव गौरी ॥१॥
कुसुम शयनमुपगम्य सपदि मदनशरविसरपरिदूना
मलयजरजसि महनलततिमिव कलयति मतिमतिदीना शिव विरहकृशा तव गौरी ॥२॥
उरसिरुचिरमणिहारलतागतबलभिदुपलततिनीला
मञ्जुवचनगृहपञ्जरशुकपरिभाषणपरिहृतलीला शिव विरहकृशा तव गौरी ॥३॥
भृशकृतभवदनुभावनयेक्षित भवति विहितपरिवादा
सपदि विहित विरहानुगमनादनुसंभृतहृदय विषादा शिव विरहकृशा तव गौरी ॥४॥
बालहरिणपरिलीढपदा तदनादरविगत विनोदा
उन्मदपरभृतविरुताकर्णनकर्णशल्यकृतबाधा शिव विरहकृशा तव गौरी ॥५॥
कोकमिथुनबहुकेळिविलोकनजृम्भितमदन विकारा
शंकरहिमकरशेखर पालय मामिति वदति न धीरा शिव विरहकृशा तव गौरी ॥६॥
दूषितमृगमदरुचिरविशेषक निटिलभसिकृतरेखा
अतनुतनुज्वरकारितया परिवर्जितचन्द्रमयूखा शिव विरहकृशा तव गौरी ॥७॥
श्रीशिवचरणनिषेवणचन्द्रशिखामणियतिवरगीतं
श्रीगिरिजाविरहक्रमवर्णनमुदयतु विनयसमेतं शिव विरहकृशा तव गौरी ॥८॥

श्लोकः
आवासमन्दिरमिदं मनुते मृडानी घोराटवीसदृशमाप्तसखीजनेन ।
ना भाषणानि तनुते नलिनायताक्षी देव त्वया विरहिता हरिणाङ्कमौले ॥

 

॥ नवमाष्टपदी ॥
बिलहरिरागेण                                                                                                       त्रिपुटतालेन गीयते
(स्तनविनिहत इतिवत्)
हिमकरमणिमयदामनिकाय कलयति वह्निशिखामुरसीयं
शैलजा शिव शैलजा विरहे तव शंकर शैलजा ॥१॥
वपुषि पतितघनहिमकरपूरं संतनुते हृदि दिवि दुरितारं शैलजा ॥२॥
उरसि निहितमृदु विततमृणालं पश्यति सपदि विलसदळिनीलं शैलजा ॥३॥
सहचरयुवतिषु नयनमनीलं नमितमुखी वितनोति विशालं शैलजा ॥४॥
रुष्यति खिद्यति मुहुरनिदानं न प्रतिवक्ति सखीमपि दीनं शैलजा ॥५॥
शिव इति शिव इति वदति सकामं पश्यति पशुरिव किमपि ललामं शैलजा ॥६॥
सुरतरुविविधफलामृतसारं पश्यति विषमिव भृशमतिघॊरं शैलजा॥७॥
यतिवरचन्द्रशिखामणिगीतं सुखयतु साधुजनं शुभगीतं शैलजा ॥८॥

श्लॊकः
त्वद्भावनैकरसिकां त्वदधीनवृत्तिं
त्वन्नामसंस्मरणसंयुतचित्तवृत्तिम् ।
बालामिमां विरहिणीं कृपणैकबन्धो
नोपेक्षसे यदि तदा तव शंकराख्या ॥२३॥
वस्तूनि निस्तुलगुणानि निराकृतानि
कस्तूरिकारुचिरचित्रकपत्रजातम् ।
ईदृग्विधं विरहिणी तनुते मृडानी
तामाद्रियस्व करुणाभरितैरपाङ्गैः ॥२४॥

 

पञ्चमः सर्ग:
श्लॊकः
एकाम्रमूलविलसन्नवमञ्जरीक
श्रीमाधवीरुचिरकुञ्जगृहेवसामि ।
तामानयानुनय मद्वचनेन गौरीमित्थं
शिवेन पुनराह सखी नियुक्ता ॥२५॥

 

॥ दशमाष्टपदी ॥
आनन्दभैरवीरागेण                                                          आदितालेन गीयते
( वहति मलयसमीरे इतिवत् )
जयति मदननृपाले शिवे कुपितपथिक जालं
भ्रमरमिथुन जाले शिवे पिबति मधु सलीलं
विरहरुजा पुरवैरी परिखिद्यति गौरी शिवविरहरुजा ॥१॥

मलयमरुति वलमाने शिवे विरह विघटनाय
सति च मधुपगाने शिवे सरसविहरणाय शिव विरहरुजा ॥२॥
कुसुमभरितसाले शिवे विततसुमधुकाले
कृपणविरहिजाले शिवे कितवहृदनुकूले शिवविरहरुजा ॥३॥
मदनविजयनिगमं शिवे जपति पिकसमूहे
चतुरकितवसङ्ग (शिवे) कुटिलरवदुरूहे शिवविरहरुजा ॥४॥
कुसुमरजसि भरिते शिवे कितवमृदुळमरुता
दिशि च विदिशि वितते शिवे विरहिवपुषि चरता शिवविरहरुजा ॥५॥
विमलतुहिनकिरणे शिवे विकिरति करजालं
विहृतिविरतिहरणे शिवे वियति दिशि विशालं शिवविरहरुजा ॥६॥
मृदुलकुसुमशयने शिवे वपुषि विरहदूने
भ्रमति लुठति दीने शिवे सुहितशरणहीने शिवविरहरुजा ॥७॥
जयति गिरिशमतिना शिवे गिरिशविरहकथनं
चन्द्रमकुटयतिना शिवे निखिलकलुषमथनं शिवविरहरुजा ॥८॥

श्लोकः
यत्रत्वामनुरञ्जयन्नतितरामारब्धकामागमं
व्यापारैरचलाधिराजतनये केलीविशेषैर्युत: ।
तत्र त्वामनुचिन्तयन्नथ भवन्नामैकतन्त्रं जपन्
भूयस्तत्परितम्भसंभ्रमसुखं प्राणेश्वरः काङ्क्षति ॥२६॥

 

॥ एकादशाष्टपदी ॥
केदारगौळरागेण                                                    आदितालेन गीयते
( रतिसुखसारे गतमभिसारे इतिवत् )
हिमगिरितनये गुरुतरविनये नियुतमदनशुभरूपं
निटिलनयनमनुरञ्जय सति तव विरहजनितघनतापं
मलयजपवने कम्पानुवने वसति सुदति पुरवैरी
युवतिहृदयमदमर्दनकुशली संभृत केलिविहारी मलयज पवने ॥१॥
वद मृदु दयिते मम हृदि नियते बहिरिव चरसि समीपं
वदति मुहुर्मुहुरिति हर मामकदेहमदनघनतापं ॥ मलयज पवने ॥२॥
उरुघन सारं हिमजल पूरं वपुषि पतितमतिघोरं
सपदि न मृष्यति शपति मनोभवमतिमृदुमलय समीरं ॥ मलयजपवने ॥३॥
विलिखति चित्रं तव च विचित्रं पश्यति सपदि समोदं
वदति झटिति बहु मामिति शम्बररिपुरतिकलयति खेदं ॥ मलयजपवने ॥४॥
अर्पयनीलं मयि धृतलीलं नयनकुसुममतिलॊलं
विरहतरुणि विरहातुरमनुभज मामिह (ति) विलपति सा (सोऽ) लं ॥ मलयजपवने ॥५॥
लसदपराधं मनसिजबाधं विमृश विनेतुमुपायं
गुरुतरतुङ्गपयोधरदुर्गमपानय हरमनपायं ॥ मलयजपवने ॥६॥
अतिधृतमाने परभृतगाने किञ्चिदुदञ्चय गानं
जहि जहि मानमनूनगुणै रमयाशु विरहचिरदीनं ॥ मलयजपवने ॥७॥
इति शिवविरहं घनतरमोहं भणति नियमिजनधीरे
चन्द्रशिखामणिनामनि कुशलमुपनय गजवरचीरे ॥ मलयजपवने ॥८॥

श्लोकः
विमल सलिलोदञ्चत्कम्पासरोरुहधोरणी-
परिमलरज: पालीसंक्रान्तमन्दसमीरणे ।
वितपति वियद्गङ्गामङ्गीचकार शिर: स्थितां
तव हि विरहाक्रान्त: कान्त: नतॊऽपि न वेदित: ॥२७॥
अनुभवति मृगाक्षी त्वद्वियोगक्षणानां
लवमिव युगकल्पं स्वल्पमात्मापराधम् ।
त्वयि विहितमनल्पम् मन्यमान: कथंचित्
नयति समयमेनं देवि तस्मिन्प्रसीद ॥२८॥
इति सहचरीवाणीमेणाङ्कमौळिमनोभव-
व्यथनकथनीमेनामाकर्ण्य कर्णसुधाझरीम् ।
सपदि मुदिता विन्यस्यन्ती पदानि शनै: शनै:
जयति जगतां माता नेतु: प्रविश्य लतागृहम् ॥२९॥
सा दक्षदेवनविहारजयानुषङ्गलीलाहवे भवति शैलजया शिवस्य ।
चेत: प्रसादमनयोस्तरसा विधाय देव्या कृतं कथयति स्म सखी रहस्यम् ॥३०॥

 

॥ द्वादशाष्टपदी ॥
शङ्कराभरणरागेण                                                 त्रिपुटतालेन गीयते
( पश्यति दिशि दिशि इतिवत् )
कलयति कलयति मनसि चरन्तं
कुचकलशस्पृशमयति भवन्तम् ।
पाहि विभो शिव पाहि विभो
निवसति गौरी केळिवने पाहि विभो ॥१॥
जपति जपति तव नाम सुमन्त्रं
प्रति मुहुरुदितसुमायुधतन्त्रं  पाहि ॥२॥
उपचितकुसुमसुदामवहन्ती
भवदनुचिन्तनमाकलयन्ती     पाहि ॥३॥
मलयजरजसि निराकृतरागा
वपुषि भसित धृतिसंयतयोगा  पाहि ॥४॥
परिहृतवेणि जटाकच भारा
निजपतिघटकजनाशयधारा    पाहि ॥५॥
अविधृतमणिमुकुटादिललामा
बिसवलयादिविधारणकामा      पाहि ॥६॥
मुहुरवलोकित किसलयशयना
बहिरुपसङ्गत सुललित नयना           पाहि ॥७॥
इति शिव भजनगुणेन विभान्तम्
चन्द्रशिखामणिना शुभगीतम् ॥   पाहि ॥८॥

श्लोकः
सा वीक्षते सहचरीं मदनेन लज्जा-
भारेण नॊत्तरवचो वदति प्रगल्भा ।
व्याधून्वति श्वसितकोष्णसमीरणेन
तुङ्गस्तनोत्तरपटं गिरिजा वियुक्ता ॥३१॥

 

षष्ठः सर्गः
श्लोकः
अथ विरहिणीमर्मच्छेदानुसंभृतपातक-
श्रित इव निशानाथ: संक्रान्तनीलगुणान्तर: ।
किरणनिकरैरञ्चत्कम्पासरित्तटरम्यभू-
वलयमभितो व्याप्त्या विभ्राजयन्परिजृम्भते ॥३२॥
विकिरति निजकरजालं हिमकरबिम्बेऽपि नागते कान्ते ।
अकृतकमनीयरूपा स्वात्मगतं किमपि वदति गिरिकन्या ॥३३॥

 

॥ त्रयॊदशाष्टपदी ॥
आहिरिरागेण                                                                झम्पतालेन गीयते
( कथितसमयेऽपि इतिवत् )
सुचिरविरहापनय सुकृतभिकामितं
सफलयति किमिह विधिरुत न विभवामितं
कामिनी किमिह कलये सहचरीवञ्चिताहं कामिनी ॥१॥
यदनुभजनेन मम सुखमखिलमायतं
तमनुकलये किमिह नयनपथमागतं कामिनी ॥२॥
येन मलयजरेणुनिकरमिदमीरितं
न च वहति कुचयुगलमुरु तदवधीरितुं कामिनी ॥३॥
यच्चरणपरिचरणमखिलफलदायकं
न स्पृशति मनसि मम हा तदुपनायकम् कामिनी ॥४॥
निगमशिरसि स्फुरति यतिमनसि यत्पदम् ।
विततसुखदं तदपि हृदि न मे किमिदम् कामिनी ॥५॥
विरहसमयेषु किल हृदि यदनुचिन्तनम् ।
न स भजति नयनपथमखिलभय कृन्तनम् कामिनी ॥६॥
कुचयुगलमभिमृशति स यदि रतसूचितम् ।
सफलमिह निखिलगुणसहितमपि जीवितम् कामिनी ॥७॥
नियमधनविधुमौळिफणितमिदमञ्चितम् ।
बहुजनिषु कलुषभयमपनयतु सञ्चितम् कामिनी ॥८॥

श्लोकः
आजग्मुषीं सहचरीं हरमन्तरेण
चिन्ताविजृम्भितविषादभरेण दीना ।
आलोक्य लॊकजननी हृदि संदिहाना
कान्तं कयाभिरमितं निजगाद वाक्यम् ॥३४॥

चतुर्दशाष्टपदी ॥
सारङ्गरागॆण                                                                त्रिपुटतालॆन गीयते
(स्मरसमरोचित इतिवत्)
कुसुमशराहवसमुचितरूपा प्रियपरिरम्भणपरिहृततापा
कापि पुररिपुणा रमयति हृदयममितगुणा कापि ॥१॥
घनतरकुचयुगमृगमदलेपा
दयितविहितरतिनव्यसुलापा कापि ॥२॥
रमणरचितकटपत्रविशेषा
उरसिलुलितमणिहारविभूषा कापि ॥३॥
दयितनिपीतसुधाधरसीमा
गलितवसनकटिपरिहृतदामा कापि ॥४॥
अधिगतमृदुतरकिसलयशयना
दरपरिमीलितचालितनयना कापि ॥५॥
विहितमधुररतिकूजितभेदा
दृढपरिरम्भणहतमेति भेदा कापि ॥६॥
महित महोरसि सरभसपतिता
लुलितकुसुमकुटिलालकमुदिता कापि ॥७॥
चन्द्रशिखामणियतिवरभणितम् ।
सुखयतु साधुजनं शिवचरितम् ॥  कापि ॥८॥

सप्तमः सर्ग:
श्लोकः
चकोराणां प्रीतिं कलयसि मयूखैर्निजकला-
प्रदानैर्देवानमपि दयितभाजां मृगदृशाम् ।
न कोकानां राकाहिमकिरण मादृग्विरहिणी-
जनानां युक्तं ते किमिदमसमं हन्त चरितम् ॥३५॥
गङ्गामङ्गनिषङ्गिपङ्कजरजोगन्धावहामङ्गनां
आश्लिष्यन्निभृतं निरङ्कुशरह: केळीविशेषैरलम् ।
विभ्रान्त: किमदभ्ररागभरितस्तस्यामुत स्यादयं
कान्तोऽश्रान्तमनङ्गनागविहतो नाभ्याशमभ्यागतः ॥३६॥
सन्तापयन्नखिलगात्रममित्रभावात्
संदृश्यते जडधियामिह शीतभानु: ।
दॊषाकरो वपुषि सङ्गतराजयक्ष्मा
घोराकृतिर्हि शिवदूति निशाचराणाम् ॥३७॥

 

॥ पञ्चदशाष्टपदी ॥
सावेरिरागेण                                                         आदितालेन गीयते
(समुदितवदने इतिवत्)
विरहितशरणे रमणीचरणे विजितारुणपङ्कजे
अरुणिमरुचिरं कलयति सुचिरं मतिमिव वपुषि निजे
रमते कम्पामहितवने विजयी पुरारिजने ॥ रमते ॥१॥
अलिकुलवलिते परिमळललिते युवतिकुटिलालके
कलयति कुसुमं विलसितसुषुमं सुमशरपरिपालके ॥ रमते ॥२॥
कुचगिरियुगले निजमतिनिगले मृगमदरचनाकरे
मणिसरनिकरं विलसितमुकुरं घटयति सुमनोहरे ॥ रमते ॥३॥
विलसितरदने तरुणीवदने किसलयरुचिराधरे
रचयति पत्रं मकरविचित्रं स्मितरुचिपरिभासुरे ॥ रमते ॥४॥
कटितटभागे मनसिजयोगे विगळितकनकाम्बरे
मणिमयरशनं रविरचिवसनं घटयति तुहिनकरे ॥  रमते ॥५॥
अधरसुधाळिं रुचिररदालिं पिबति सुमुखशंकरे
विदधति मधुरं हसति च विधुरं रतिनिधिनिहितादरे ॥ रमते ॥६॥
मृदुलसमीरे वलति गभीरे विलसति तुहिनकरे
उदितमनोजं विकसदुरोजं शिवरतिविहितादरे ॥ रमते ॥७॥
इति रसवचने शिवनति रचने पुरहरभजनादरे
बहुजनिकलुषं निरसतु परुषं यतिवरविधुशेखरे ॥ रमते ॥८॥

श्लोकः
आयातवानिह न खेदपरानुषङ्ग-
वाञ्छाभरेण विवशस्तरुणेन्दुमौलि: ।
स्वच्छ्न्दमेव रमतां तव कोऽत्र दोषः
पश्याचिरेण दयितं मदुपाश्रयस्थम् ॥३८॥

 

॥ अष्टमः सर्ग: ॥
श्लोकः
मत्प्राणनेतुरसहायरसालमूल-
लीलागृहस्य मयि चेदनुरागबन्ध: ।
अन्याकथानुभविन: प्रणयानुबन्धो
दूति प्रसीदति ममैष महानुभाव: ॥३९॥

 

॥ षोडशाष्टपदी ॥
पुन्नागवराली रागेण                                                आदितालेन गीयते
(अनिलतरलकुवलयनयनेन इतिवत्)
अरुणकमलशुभतरचरणेन सपदि गता न हि भवतरणेन ॥ या विहृता पुरवैरिणा ॥१॥
स्मितरुचिहिमकरशुभवदनेन निहितगुणा विलसितसदनेन ॥ या विहृता ॥२॥
सरसवचनजितकुसुमरसेन हृदि विनिहितरतिकृतरभसेन ॥ या विहृता ॥३॥
विहित विविधकुसुमशरविहृते नानागतरसा नयगुण विहितेन ॥ या विहृता ॥४॥
उदितजलजरुचिरगळेन स्फुटितमना न युवतिनिगळेन ॥ या विहृता ॥५॥
कनकरुचिरसुजटापटलेनानुहतसुखासतिलकनिटिलेन ॥ या विहृता ॥६॥
निखिलयुवतिमदनोदयनेन ज्वरितमाना न विरहदहनेन ॥ या विहृता ॥७॥
तुहिनकिरणधरयतिरचनेन सुखयतु मां शिवहितवचनेन ॥ या विहृता ॥८॥

श्लॊकः
अयि मलयसमीर क्रूर भावोरगाणां
श्वसितजनित किं ते  मादृशीहिंसनेन ।
क्षणमिव सहकारादीशगात्रानुषङ्ग-
उपहृतपरिमलात्मा संनिधॆहि प्रसन्न: ॥४०॥

॥ नवम: सर्गः ॥
श्लोकः
इत्थं रुषा सहचरीं परुषं वदन्ती
शैलाधिराजतनुजा  तनुजातकार्श्या ।
नीत्वा कथं कथमपि क्षणदां महेश:
माग: प्रशान्ति विनतं कुटिलं बभाषे ॥४१॥

 

॥ सप्तदशाष्टपदी ॥
आरभीरागेण                                                         त्रिपुटतालेन गीयते
(रजनिजनितगुरु इतिवत्)
चतुरयुवतिसुरतादर जागरितारुणमधृतविलासं
निटिलनयन नयनद्वितयं तव कथयति तदभिनिवेशम् ।
पाहि तामिह फाललोचन या तव दिशति विहारं
गरळमिलितधवलामृतमिव हरमागमवचनमसारं पाहि ॥
गुरुतरकुचपरिरम्भणसंभृतकुङ्कुमपङ्किलहारं
स्मरति विशालमुरो विशदं तव रतिरभसादनुरागं पाहि ॥२॥
रतिपतिसमरविनिर्मित निशितनखक्षतचिह्नितरेखं
वपुरिदमळिकविलोचन लसदिव रतिभरकृतजयरेखं पाहि ॥३॥
रदनवसनमरुणमिदं तव पुरहर भजति विरागं
विगलितहिमकरशकलमुदंचितदर्शितरतिभरवेगं पाहि ॥४॥
युवतिपदस्थितयावकरसपरिचिन्तितरतिकमनीयं
विलसति वपुरिदमलघुबहिर्गतमयति विरागममेयं पाहि ॥५॥
युवतिकृतव्रणमधरगतं तव कलयति मम हृदि रोषं
प्रियवचनावसरेऽपि मया सह स्फुटयति तत्परितोषम् पाहि ॥६॥
सुरतरुसुमदामनिकायनिबद्धजटावलिवलयमुदारं
कितवमनोभवसंगरशिथिलितमनुकथयति सुविहारं पाहि ॥७॥
इति हिमगिरिकुलदीपिकया कृतशिवपरिवदनविधानं
सुखयतु बुधजनमीशनिषेवणयतिवरविधुशेखरगानम् पाहि ॥८॥

श्लोकः
ईदृग्विधानि सुबहूनि तव प्रियायां
गाढानुरागकृतसङ्गमलाञ्छितानि ।
साक्षदवेक्षितवतीमिह मामुपेत्य
किं भाषसे कितवशेखर चन्द्रमौळे ॥४२

 

॥ दशमः सर्ग : ॥
श्लोकः
तामुद्यतप्रसवबाणविकारखिन्नां
संचिन्त्यमानशशिमौलिचरित्रलीलाम् ।
बालां तुषारगिरिजां रतिकेलिभिन्नां
आळि: प्रियाथ कलहान्तरितामुवाच ॥४३॥

 

॥ अष्टादशाष्टपदी ॥
यदुकुलकाम्भोजिरागॆण                                            आदितालेन गीयते
(हरिरभिसरति इतिवत्)
पुररिपुरभिरतिमति हृदि तनुते
भवदुपगूहनमिह बहु मनुते
शंकरे हे शंकरि मा भज
मानिनि परिमानमुमे शंकरे ॥१।
मृगमदरसमय गुरुकुचयुगले कलयति पुररिपुरथ मति निगले शंकरे ॥२।
सुचिरविरहभवमपहर कलुषं भवदधरामृतमुपहर निमिषं  शंकरे ॥३।
सरस निटिलकृतचित्रकरुचिरं तव वदनं स च कलयति सुचिरं शंकरे ॥४॥
विभुरयमेष्यति शुभतरमनसा तदुरसि कुचयुगमुपकुरु सहसा  शंकरे ॥५॥
सकुसुमनिकरमुदञ्चय चिकुरं सुदति विलोकय मणिमय मुकुरम् शंकरे ॥६॥
श्रृणु सखि शुभदति मम हितवचनं घटय  जघनमपि विगलितरशनं  शंकरे ॥७॥
श्रीविधुशेखरयतिवरफणितं सुखयतु साधुजनं शिवचरितं शंकरे ॥८॥
महादेवे तस्मिन्प्रणमति निजाग: शमयितुं
तदीयं मूर्धानं प्रहरसि पदाभ्यां गिरिसुते ।
स एष क्रुद्धश्चेत्तुहिनकिरणं स्थापयति चेत्
मृदून्यङ्गान्यङ्गारक इव तनोत्यॆष पवन: ॥४४।

 

॥ एकादशः सर्ग: ॥
इत्थं प्रियां सहचरीं गिरमुद्गिरन्तीं
चिन्ताभरेण चिरमीक्षितुमप्यधीरा ।
गौरी कथंचिदभिमानवती ददर्श
कान्तं प्रियानुनयवाक्य मुदीरयन्तम् ॥४५॥
बाले कुलाचलकुमारि विमुञ्च रोषं
दॊषं च मय्यधिगतं हृदये न कुर्याः ।
शक्ष्यामि नैव भवितुं भवतीं विनाहं
वक्ष्यामि किं तव पुर: प्रियमन्यदस्मात् ॥४६॥

 

॥ एकोनविंशाष्टपदी ॥
मुखारि रागेण                                                       झंपतालेन गीयते
(वदसि यदि किंचिदपि इतिवत्)
भजसि यदि मयि रोषमरुणवारिरुहाक्षि
किमिह मम शरणमभिजातं
शरणमुपयायतवति कलुषपरिभावनं
न वरमिति सति सुजनगीतं शिवे शैलकन्ये
पञ्चशरतपनमिह जातं
हरकमलशीतलं सरसनयनाञ्चलं
मयि कलय रतिषु कमनीयम् शिवे शैलकन्ये ॥१॥
स्पृशसि यदि वपुररुणकमलसमपाणिना
न स्पृशसि तपनमनिवारं
दरहसितचन्द्रकरनिकरमनुषञ्जयसि
यदि मम च हृदयमतिधीरं  शिवे शैलकन्ये ॥२॥
कुसुमदामचयेन मम जटावलिजूटनिचयमयि सुदति सविलासं
सपदि कलयामि वलयाकृतिसरोजवनसुरसरितमुपहसितभासम्  शिवे शैलकन्ये ॥३॥
अमलमणिहारनिकरेण परिभूषयसि
पृथुल कुचयुगल मतिभारम् ।
तुहिनगरिशिखरानुगळितसुरनिम्नगा
सुगळसमभावसुगभीरम्  शिवे शैलकन्ये ॥४॥
विकसदसिताम्बुरुहविमलनयना-
ञ्चलैरुपचरसि विरहपरिदूनम् ।
सफलमिह जीवितं मम सुदति कोपने
विसृज मयि सफलमतिमानम्  शिवे शैलकन्ये ॥५॥
भवदधर मधु वितर विषमशरविकृति-
हरमयि वितर रतिनियतभानम्
स्फुयमदपराधशतमगणनीयमिह
विमृश भवदनुसृतिविधानम् शिवे शैलकन्ये ॥६॥
कुपितहृदयासि मयि कलय भुजबन्धने
कुरु निशितरदनपरिपातम्
उचितमिदमखिलं तु नायिके सुदति मम
शिक्षणं स्वकुचगिरिपातं शिवे शैलकन्ये ॥७॥
इति विविधवचनमपि चतुरपुरवैरिणा
हिमशिखरिजनुषमभिरामं
शिवभजननियतमतियतिचन्द्रमौलिना
फणितमपि जयतु भुवि कामं  शिवे शैलकन्ये ॥८॥

श्लोकः
सुचिर विरहाक्रान्तं विभ्रान्तचित्तमितस्तत:
स्मरपरवशं दीनं नोपेक्षसे यदि मां प्रिये ।
अहमिह चिरं जीवन्भावत्कसेवनमाद्रिये
यदपकरणं सर्वं क्षन्तव्यमद्रिकुमारिके ॥४७॥

 

॥ द्वादशः सर्ग : ॥
श्लोकः
इति विरहितामेनां चेत: प्रसादवतीं शिवां   
अनुनयगिरां गुम्फै: संभावयन्निजपाणिना ।
झटिति घटयन्मन्दस्मेरस्तदीयकराम्बुजं
हिमकरकलामौलि: संप्राप केलिलतागृहम् ॥४८॥
संप्राप्य केळीगृहमिन्दुमौलि: इन्दीवराक्षीमनुवीक्षमाण: ।
जहौ रह: केलिकुतूहलेन वियोगजार्तिं पुनराबभाषे ॥४९॥

 

॥ विंशाष्टपदी ॥
घण्टारागेण                                                          झंपतालेन गीयते
(मञ्जुतरकुञ्जतल इतिवत्)
पृथुलतरललितकुचयुगलमयि ते
मृगमदरसेन कलयामि दयिते ।
रमय बाले भवदनुगमेनं रमय बाले ॥१॥
विधुशकलरुचिरमिदमलिकमयि ते
शुभतिलकमभिलसतु केलिनियते रमय बाले ॥२॥
इह विहर तरुणि नव कुसुमशयने
भवदधरमधु वितर मकरनयने रमय बाले ॥३॥
अयि सुचिरविरहरुजमपहर शिवे
सरसमभिलप रमणि परभृतरवे रमय बाले ॥४॥
कलय मलयजपङ्कमुरसि मम ते
कठिनकुचयुगमतनु घटय ललिते रमय बाले ॥५॥
इदममरतरुकुसुमनिकरमयि ते
घनचिकुरमुपचरतु सपदि वनिते रमय बाले ॥६॥
दरहसितविधुकरमुदञ्चय मनो-
भवतपनमपनुदतु विलसितघने रमय बाले ॥७॥
शिवचरणपरिचरणयतविचारे
फणति हिमकरमौळिनियमिधीरे  रमय बाले ॥८॥

श्लोकः
ईदृग्विधैश्चटुलचाटुवचोविलासै:      
गाढोपगूहनमुखाम्बुजचुम्भनाद्यै: ।
आह्लादयन् गिरिसुतामधिकाञ्चि नित्यं
एकाम्रमूलवसतिर्जयति प्रसन्न: ॥५०॥
विद्याविनीतजयदेवकवेरुदार-
गीतिप्रबन्धसरणिप्रणिधानमात्रात् ।
एषा मया विरचिता शिवगीतिमाला
मोदं करोतु शिवयो: पदयोजनीया ॥५१॥
अव्यक्तवर्णमुदितेन यथार्भकस्य
वाक्येन मोदभरितं हृदयं हि पित्रो: ।
एकाम्रनाथ भवदङ्घ्रिसमर्पितेयं
मोदं करोतु भवत: शिवगीतिमाला ॥५२॥
गुणानुस्यूतिरहिता दोषग्रन्थिविदूषिता ।
तथापि शिवगीतिर्नो मालिका चित्रमीदृशी ॥५३॥

ॐ नम: शिवायै च नम: शिवाय
॥ शुभमस्तु ॥

Encoded: P. R. Kannan, Navi Mumbai

 

ॐ तत् सत्


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